30 अक्टूबर 2026 | नई दिल्ली : IDBI Bank की हिस्सेदारी निजी कंपनी को बेचने के केंद्र सरकार के फैसले ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सौदे पर सवाल उठाते हुए बैंक के कर्मचारियों के प्रति समर्थन जताया है। उनका कहना है कि कर्मचारियों की मेहनत से वित्तीय संकट से बाहर निकले बैंक को अब निजी कंपनी के नियंत्रण में सौंपा जा रहा है। राहुल गांधी ने यह भी चिंता जताई कि निजीकरण के बाद कर्मचारियों की नौकरी से जुड़ी सुरक्षा और आरक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए सरकार के फैसले का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि IDBI Bank के रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया निर्धारित नियमों और आवश्यक प्रक्रियाओं के तहत पूरी की गई है। वित्त मंत्री ने कांग्रेस के पुराने कार्यकाल में बैंकिंग व्यवस्था और कर्ज वितरण को लेकर भी सवाल उठाए।
दरअसल, केंद्र सरकार ने IDBI Bank की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने और प्रबंधन नियंत्रण निजी निवेशक को सौंपने के लिए 52,878.08 करोड़ रुपये के सौदे को मंजूरी दी है। इस सौदे में कनाडा की वित्तीय सेवा कंपनी Fairfax Financial Holdings से जुड़ी कंपनी खरीदार है।
Table of Contents
- राहुल गांधी ने कर्मचारियों के समर्थन में उठाई आवाज
- लोकसभा में भी उठा चुके हैं बैंक बिक्री का मुद्दा
- निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर साधा निशाना
- क्या है IDBI Bank का 52,878 करोड़ रुपये का सौदा?
- बैंक के कर्मचारियों और आरक्षण को लेकर चिंता
- NPA में आई बड़ी गिरावट, सरकार ने गिनाईं उपलब्धियां
- निजीकरण के बाद क्या बदल सकता है?
राहुल गांधी ने कर्मचारियों के समर्थन में उठाई आवाज
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर IDBI Bank के कर्मचारियों के नाम एक पत्र साझा किया। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने बैंक की प्रस्तावित बिक्री पर अपनी नाराजगी जाहिर की और कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि कांग्रेस उनके मुद्दों को उठाती रहेगी।
राहुल गांधी ने बताया कि मार्च 2025 में IDBI Bank के कुछ कर्मचारी संसद परिसर में उनसे मिले थे। उस मुलाकात के दौरान कर्मचारियों ने बैंक की बिक्री को लेकर चिंता जताई थी। उनका सवाल था कि जिस बैंक को कर्मचारियों ने कठिन परिस्थितियों से निकालकर बेहतर वित्तीय स्थिति तक पहुंचाया, उसे सरकार बेचने का फैसला क्यों कर रही है।
कांग्रेस नेता के अनुसार, कर्मचारियों की इस चिंता को उन्होंने लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने सरकार से पूछा था कि बैंक की बिक्री की जरूरत क्यों महसूस हुई और इस फैसले के बाद कर्मचारियों तथा बैंक में पैसा जमा करने वाले ग्राहकों के हितों की रक्षा किस तरह की जाएगी।
राहुल गांधी ने अपने संदेश में कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हें केवल बिक्री योग्य संपत्ति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इनकी भूमिका आम लोगों और देश के विकास से जुड़ी हुई है।
लोकसभा में भी उठा चुके हैं बैंक बिक्री का मुद्दा
राहुल गांधी ने अपने पत्र में पुरानी मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा कि IDBI Bank के कर्मचारियों ने उनसे सीधे तौर पर पूछा था कि सरकार एक ऐसे बैंक को क्यों बेच रही है, जिसे उन्होंने अपनी मेहनत से मुनाफे की स्थिति में पहुंचाया है।
उन्होंने दावा किया कि इस सवाल को संसद में उठाने के बावजूद उन्हें सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिला। अब जब बैंक की हिस्सेदारी बेचने का फैसला आगे बढ़ चुका है, तो उन्होंने दोबारा इस मुद्दे को सार्वजनिक किया है।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि बैंक कर्मचारियों की सेवा शर्तें पहले से कमजोर हुई हैं और निजी स्वामित्व आने के बाद उनके पास मौजूद सुरक्षा और कम हो सकती है। उन्होंने कांग्रेस की नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि पार्टी मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी का भी समर्थन करती है।
निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर साधा निशाना
राहुल गांधी के बयान के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि IDBI Bank के रणनीतिक पुनर्गठन और हिस्सेदारी बिक्री में सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।
वित्त मंत्री ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसके शासनकाल में बैंकों और वित्तीय संस्थानों को निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया गया। उन्होंने दावा किया कि बैंक कर्मचारियों पर कई बार ऐसे लोगों को कर्ज देने का दबाव बनाया गया, जिनके मामलों में सामान्य बैंकिंग नियमों और सावधानियों का पालन नहीं किया गया।
सीतारमण का कहना है कि मौजूदा सरकार ने IDBI Bank की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए कदम उठाए हैं। उन्होंने बैंक में पूंजी निवेश और खराब ऋणों में आई कमी का उल्लेख करते हुए सरकार के प्रयासों को सही ठहराया।
इस तरह IDBI Bank की बिक्री को लेकर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। कांग्रेस जहां कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं केंद्र सरकार इसे बैंक के भविष्य के लिए रणनीतिक फैसला बता रही है।
क्या है IDBI Bank का 52,878 करोड़ रुपये का सौदा?
केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर 2026 को IDBI Bank की रणनीतिक बिक्री को मंजूरी दी थी। इस योजना के तहत सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी Fairfax Financial Holdings से जुड़ी कंपनी को बेचेंगे।
सौदे की कुल कीमत 52,878.08 करोड़ रुपये तय की गई है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 30.48 प्रतिशत और LIC की ओर से 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेची जाएगी। इसके साथ ही बैंक का प्रबंधन नियंत्रण भी नए निवेशक को सौंपने की योजना है।
सौदे से जुड़ी प्रमुख जानकारी इस प्रकार है:
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| बैंक | IDBI Bank |
| प्रस्तावित खरीदार | Fairfax समूह से जुड़ी कनाडाई कंपनी |
| कुल बेची जाने वाली हिस्सेदारी | 60.72 प्रतिशत |
| केंद्र सरकार की हिस्सेदारी | 30.48 प्रतिशत |
| LIC की हिस्सेदारी | 30.24 प्रतिशत |
| सौदे की कीमत | ₹52,878.08 करोड़ |
| प्रस्तावित प्रबंधन नियंत्रण | निजी निवेशक को |
इस सौदे को भारत के बड़े रणनीतिक विनिवेश सौदों में गिना जा रहा है। सरकार के लिए यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने का महत्वपूर्ण कदम है। वहीं, निजी निवेशक के लिए भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर माना जा रहा है।
बैंक के कर्मचारियों और आरक्षण को लेकर चिंता
IDBI Bank की बिक्री का विरोध करते हुए राहुल गांधी ने कर्मचारियों के भविष्य और सामाजिक आरक्षण के मुद्दे को भी उठाया है। उन्होंने कहा कि बैंक के निजी स्वामित्व में जाने के बाद अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवारों के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
उनका तर्क है कि सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में आरक्षण और कर्मचारियों को मिलने वाली कुछ सुविधाएं सरकारी नीतियों से जुड़ी होती हैं। निजी स्वामित्व आने के बाद इन व्यवस्थाओं की स्थिति बदल सकती है।
हालांकि, इस मुद्दे पर अंतिम स्थिति सौदे की शर्तों, लागू कानूनों और बैंक की भविष्य की रोजगार नीतियों पर निर्भर करेगी। इसलिए आरक्षण और सेवा सुरक्षा को लेकर राहुल गांधी की चिंता को उनके राजनीतिक बयान के रूप में समझना जरूरी है। इसे पहले से लागू हो चुके बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कर्मचारियों के अलावा बैंक के ग्राहकों और जमाकर्ताओं के हित भी इस सौदे से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हैं। राहुल गांधी ने सरकार से इन्हीं लोगों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट जवाब मांगा है।
NPA में आई बड़ी गिरावट, सरकार ने गिनाईं उपलब्धियां
IDBI Bank की बिक्री पर चल रही बहस में बैंक की वित्तीय स्थिति भी अहम मुद्दा बन गई है। पिछले कुछ वर्षों में बैंक के खराब कर्ज यानी Non-Performing Assets (NPA) में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2018 में बैंक का ग्रॉस NPA 31.78 प्रतिशत था। मार्च 2026 तक यह घटकर 2.32 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में नेट NPA भी 17.30 प्रतिशत से कम होकर 0.15 प्रतिशत पर पहुंच गया।
सरकार ने बैंक की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए 2010 से 2020 के बीच लगभग 25,000 करोड़ रुपये की पूंजी उपलब्ध कराई थी। सरकार का कहना है कि पूंजी निवेश और बैंकिंग व्यवस्था में किए गए सुधारों से IDBI Bank को संकट से बाहर निकालने में मदद मिली।
वहीं, राहुल गांधी बैंक की बेहतर होती स्थिति का श्रेय कर्मचारियों की मेहनत को दे रहे हैं। उनका कहना है कि जब बैंक की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है, तो उसकी हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
निजीकरण के बाद क्या बदल सकता है?
IDBI Bank का सौदा पूरा होने के बाद बैंक के स्वामित्व और प्रबंधन व्यवस्था में बदलाव आएगा। नए निवेशक को प्रबंधन नियंत्रण मिलने से बैंक की कारोबारी रणनीति, संचालन और भविष्य की योजनाओं में बदलाव संभव है।
हालांकि, कर्मचारियों की सेवा शर्तों, ग्राहकों की जमा राशि और बैंकिंग सेवाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह संबंधित नियमों और सौदे की शर्तों के अनुसार तय होगा। इन विषयों पर स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है, ताकि कर्मचारियों और ग्राहकों की आशंकाओं का समाधान हो सके।
फिलहाल यह मामला आर्थिक फैसले के साथ-साथ राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है। सरकार इसे बैंक के विकास और निजी निवेश को बढ़ावा देने वाला कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की भूमिका और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सवाल उठा रही है।
आने वाले समय में IDBI Bank की बिक्री से जुड़ी औपचारिकताएं और कर्मचारियों के हितों पर सरकार का रुख इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे।
Prominent Journalist Amritpal Singh
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As a senior journalist and Director of Chardikala Time TV, he has played a vital role in strengthening Punjabi media at a global level.










