तारीखों के बोझ तले दबा न्याय: 8 साल, सैंकड़ों चक्कर, फिर भी खाली हाथ है पीड़ित।

​मंगलवार को तहसील कचहरी छाता एक पीड़ित न्याय पाने की आस से भटकता हुआ मिला, कहते हैं न्याय में देरी अन्याय के समान है, और यह बात जगदीश पुत्र परशुराम निवासी रनवारी थाना छाता के जीवन पर सटीक बैठती है। पिछले आठ वर्षों से अदालत की चौखट पर अपनी चप्पलें घिस रहे जगदीश अब पूरी तरह टूट चुके हैं। न्याय की उम्मीद में शुरू हुआ यह सफर अब एक अंतहीन मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना बन चुका है।
​केस का संक्षिप्त विवरण
​मामला वर्ष 2018 का है, जब पैतृक जमीन पर घर परिवार के लोगों के द्वारा फर्जी तरीके से एक बटे 9 हिस्से की जगह पर एक बटा तीन हिसाब दिखाकर बहनामा कर कब्जा कर लेना , जैसे- जमीन विवाद/धोखाधड़ी को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हुई थी। पीड़ित को उम्मीद थी कि सच सामने आएगा और उन्हें जल्द राहत मिलेगी। लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी मामला गवाहों, दलीलों और तारीखों के मकड़जाल में उलझा हुआ है।
​सिस्टम की सुस्ती, पीड़ित की मजबूरी
​पीड़ित ने नम आँखों से बताया कि इन आठ सालों में उन्होंने न केवल अपनी जमा-पूंजी गंवाई, बल्कि उनका परिवार भी इस अनिश्चितता के कारण मानसिक तनाव से गुजर रहा है। पीड़ित का कहना है।हर बार एक नई तारीख मिलती है। घर से इस उम्मीद में निकलता हूँ कि आज शायद फैसला होगा, लेकिन शाम को केवल अगली तारीख लेकर लौटता हूँ। अब शरीर और मन दोनों थक चुके हैं। उसने कहा कि फिर भी मुझे उम्मीद है कि न्याय जरूर मिलेगा।

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