–हिंदू धर्म के चिंतन, सनातन मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा का महाअनुष्ठान है अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन : स्वामी रामदेव
–भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक प्रसार का मंच बनेगा अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन
–सनातन मूल्यों, हिंदू दर्शन और संस्कृत के संरक्षण-संवर्धन पर होगा तीन दिन मंथन
हरिद्वार, 27 अक्टूबर। भारतीय ज्ञान परंपरा, सनातन मूल्यों और हिंदू दर्शन की वैश्विक प्रासंगिकता को नई दिशा देने के उद्देश्य को लेकर आयोजित होने जा रहे 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन की तैयारियां अंतिम दौर में है। सम्मेलन 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आयोजित किया जाएगा। इसमें देश-विदेश के विद्वान प्राच्यविद्या, भारतीय दर्शन, संस्कृति, इतिहास, संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर विचार-विमर्श करेंगे।
योगगुरु स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने मंगलवार को पतंजलि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल में होने जा रहे दिव्य और भव्य अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के महाकुंभ की तैयारियों की समीक्षा की।
स्वामी रामदेव ने कहा कि अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन केवल एक अकादमिक सम्मेलन नहीं, बल्कि सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और प्राच्य ज्ञान परंपरा के चिंतन, संरक्षण एवं प्रसार का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। उन्होंने कहा कि वेद, दर्शन, संस्कृत, आध्यात्मिक चिंतन और नैतिक मूल्यों से समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा आज के वैश्विक समाज को भी दिशा देने की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन की समत्वबुद्धि, धर्म, कर्तव्य और मानव कल्याण की अवधारणाएं सार्वकालिक हैं। भारतीय संस्कृति की निरंतरता और व्यापकता को समझने के लिए प्राच्यविद्या का गंभीर अध्ययन आवश्यक है। ऐसे सम्मेलन भारतीय ज्ञान-विरासत को समकालीन संदर्भों में समझने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर प्रदान करते हैं।
शिक्षा और संस्कृत के भविष्य पर होगा विशेष विमर्श
स्वामी रामदेव ने 30 अक्टूबर को प्रस्तावित ‘सनातन शास्त्र विमर्श’ को सम्मेलन का महत्वपूर्ण आयाम बताया। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और शिक्षाविदों के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बनेगा। इसमें भविष्य की शिक्षा, संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान और कौशल अर्जित करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिकता, कर्तव्यबोध, सांस्कृतिक चेतना और मानव कल्याण की भावना विकसित करना भी है। भारतीय शास्त्रीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर प्रयास करने होंगे, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझते हुए भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सके।
संस्थाओं के समन्वय से मजबूत होगी सांस्कृतिक चेतना
आदि शंकराचार्य की दृष्टि का उल्लेख करते हुए स्वामी रामदेव ने धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के बीच सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी में सनातन मूल्यों, भारतीय संस्कृति और हिंदू दर्शन के प्रति सम्मान, गौरव तथा आत्मबोध विकसित करना समय की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान-विरासत को व्यापक शैक्षिक विमर्श से जोड़ने के लिए विभिन्न संस्थाओं की साझा पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
तैयारियों की समीक्षा, गुणवत्ता और समन्वय पर जोर
सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा करते हुए स्वामी रामदेव ने सभी संबंधित विभागों को अपने दायित्वों का निर्वहन पूर्ण तत्परता, गुणवत्ता, अनुशासन और आपसी समन्वय के साथ करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इतने व्यापक आयोजन की सफलता सूक्ष्म योजना, टीम भावना और समर्पण पर निर्भर करती है। बैठक में विभिन्न टीमों ने अपनी तैयारियों और व्यवस्थाओं की जानकारी साझा की तथा आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त किए।
बैठक में पतंजलि विवि के कुलपति आचार्य बालकृष्ण, प्रति कुलपति साध्वी देवप्रिया, डॉ. वेदप्रिया, क्रय समिति की अध्यक्षा बहन अंशुल, संप्रेषण विभाग प्रमुख बहन पारुल, संकायाध्यक्ष मयंक अग्रवाल सहित सम्मेलन के समन्वयक, शिक्षकगण तथा आईटी, प्रशासन, सुरक्षा, लेखा एवं अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
——————————————-
प्राच्यविद्या सम्मेलन के प्रमुख आकर्षण
विशाल पुस्तक मेले का आयोजन: इसमें वेद, उपनिषद, भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य, योग, आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी पुस्तकों एवं शोध प्रकाशनों का प्रदर्शन होगा।
भारतीय संस्कृति की भव्य प्रदर्शनी: उत्तराखंड की लोककला, पारंपरिक जीवनशैली, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलेगी।
लोक खानपान और परंपराएं: भारत की विविध क्षेत्रीय परंपराओं, पारंपरिक खानपान और लोकजीवन से परिचित होने का अवसर मिलेगा।
पंडित परिषद एवं शास्त्रार्थ: पारंपरिक शास्त्रों, भारतीय दर्शन और शास्त्रीय ज्ञान के विविध आयामों पर विद्वानों के बीच गंभीर विमर्श होगा।
सनातन शास्त्र विमर्श: 30 अक्टूबर को आयोजित इस विमर्श में कुलपतियों और शिक्षाविदों के बीच शिक्षा के भविष्य, संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने जैसे विषयों पर संवाद होगा।
शिक्षा संवाद एवं युवा शक्ति विमर्श: कार्यक्रम में नई पीढ़ी, शिक्षा के भविष्य और भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श होगा।
कवि गोष्ठी एवं साहित्यिक आयोजन: आयोजनों के माध्यम से संस्कृत और भारतीय काव्य परंपरा की रचनात्मक अभिव्यक्तियों को मंच मिलेगा।
शास्त्रीय संगीत, नृत्य एवं लोककलाएं: देश के विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध कलात्मक विरासत की झलक प्रस्तुत की जाएगी।
योग, आयुर्वेद एवं प्राचीन चिकित्सा पद्धतियां: पारंपरिक भारतीय चिकित्सा ज्ञान, आधुनिक शोध और समकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच समन्वय की संभावनाओं पर चर्चा होगी।
शोधपत्र एवं अकादमिक सत्र: इन सत्रों में प्राच्यविद्या, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा-विज्ञान, पांडुलिपि अध्ययन और भारतीय ज्ञान प्रणाली के विविध आयामों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएंगे।
Prominent Journalist Amritpal Singh
Significant Contributions to Journalism & Media
As a senior journalist and Director of Chardikala Time TV, he has played a vital role in strengthening Punjabi media at a global level.










