नई दिल्ली | 6 अगस्त 2026
📑 विषय सूची (Table of Contents)
| क्रमांक | विषय |
|---|---|
| 1 | पराली और गोबर से बदल रही भारत की तस्वीर |
| 2 | क्या है कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG)? |
| 3 | एक टन कृषि अपशिष्ट से कितना उत्पादन? |
| 4 | किसानों और अर्थव्यवस्था को क्या होगा फायदा? |
| 5 | पर्यावरण संरक्षण में CBG की भूमिका |
| 6 | सरकार की SATAT और GOBARdhan योजना |
| 7 | भारत में CBG की संभावनाएं |
| 8 | निष्कर्ष |
भारत में जिस पराली को कभी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण माना जाता था, वही अब देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वर्षों तक किसानों के पास फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन नहीं होने के कारण पराली जलाना मजबूरी बन गया था। इससे हर साल सर्दियों के मौसम में दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में वायु प्रदूषण गंभीर स्तर तक पहुंच जाता था। वहीं खुले में पड़ा गोबर भी मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस छोड़कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता था।
अब आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से यही कृषि और डेयरी अपशिष्ट स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत बन रहे हैं। कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट इन जैविक अवशेषों को उपयोगी ईंधन और प्राकृतिक खाद में बदल रहे हैं, जिससे किसानों, पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था—तीनों को लाभ मिलने की संभावना है।
कृषि अपशिष्ट में छिपी है बड़ी ऊर्जा क्षमता
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष पशुओं से लगभग 165 करोड़ टन गोबर और खेती से करीब 68.6 करोड़ टन फसल अवशेष निकलते हैं। इनमें पराली, गन्ने की खोई (बैगास), प्रेसमड और भूसे जैसी लगभग 23.4 करोड़ टन जैविक सामग्री का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अनुपयोगी जैविक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो हर वर्ष लगभग 2 करोड़ टन कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) का उत्पादन किया जा सकता है। यह गैस गुणवत्ता के मामले में सीएनजी (CNG) के समान मानी जाती है और परिवहन, उद्योग तथा अन्य ऊर्जा जरूरतों के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।
कैसे बनती है CBG और क्या मिलता है इससे?
CBG प्लांट में गोबर, पराली, गन्ने के अवशेष और अन्य जैविक कचरे को नियंत्रित वातावरण में प्रोसेस किया जाता है। इस प्रक्रिया से पहले कच्ची बायोगैस तैयार होती है, जिसे शुद्ध और कम्प्रेस करने के बाद CBG में बदला जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक टन जैविक कचरे से लगभग 40 से 60 घन मीटर कच्ची बायोगैस तैयार होती है। शोधन के बाद इससे करीब 50 से 55 किलोग्राम CBG प्राप्त की जा सकती है।
इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि गैस निकालने के बाद बचा अवशेष भी बेकार नहीं जाता। इससे लगभग 250 से 300 किलोग्राम जैविक खाद तैयार होती है, जिसे खेतों में उपयोग किया जा सकता है। यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर सकती है।
किसानों की आय बढ़ाने का नया अवसर
CBG प्लांट किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकते हैं। किसान फसल अवशेष और गोबर बेचकर आमदनी प्राप्त कर सकते हैं, जबकि प्लांट संचालकों को भी गैस और जैविक खाद की बिक्री से आय होती है।
सरकार की SATAT (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) पहल के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां निर्धारित दरों पर CBG खरीदने की व्यवस्था करती हैं। इससे निवेशकों और उद्यमियों को बाजार की अनिश्चितता का सामना कम करना पड़ता है।
इसके अलावा, जैविक खाद की बढ़ती मांग किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकती है।
आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम
भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिस पर हर वर्ष भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यदि देश में बड़े पैमाने पर CBG उत्पादन बढ़ता है, तो प्राकृतिक गैस के आयात में कमी लाई जा सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित हजारों CBG प्लांट पूरी क्षमता से संचालित होते हैं, तो घरेलू स्तर पर स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता बढ़ेगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नया आधार मिलेगा।
पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका
CBG तकनीक केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।
- पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण में कमी आ सकती है।
- खुले में सड़ने वाले गोबर से निकलने वाली मीथेन गैस को नियंत्रित किया जा सकता है।
- ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आने की संभावना रहती है।
- जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता और ऑर्गेनिक कार्बन में सुधार हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से कई राज्यों की कृषि भूमि की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। ऐसे में जैविक खाद मिट्टी की सेहत सुधारने में उपयोगी साबित हो सकती है।
सरकारी योजनाएं और निवेश की संभावनाएं
केंद्र सरकार CBG क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है। इनमें SATAT, गोबरधन (GOBARdhan) और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की विभिन्न सहायता योजनाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, बायोमास संग्रहण मशीनों पर अनुदान, प्राथमिकता क्षेत्र के अंतर्गत ऋण सुविधा तथा अन्य वित्तीय प्रोत्साहन भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं, ताकि निजी निवेश को बढ़ावा मिल सके।
हालांकि, सरकार का लक्ष्य देशभर में हजारों CBG प्लांट स्थापित करना है, लेकिन वर्तमान में इनकी संख्या लक्ष्य की तुलना में काफी कम है। ऐसे में इस क्षेत्र में निवेश और बुनियादी ढांचे के विस्तार की आवश्यकता बनी हुई है।
कृषि अपशिष्ट और गोबर को अब केवल कचरा नहीं, बल्कि ऊर्जा और आय के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जा रहा है। यदि CBG परियोजनाओं का विस्तार योजनानुसार होता है, तो इससे किसानों की आय बढ़ाने, प्रदूषण कम करने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने जैसे कई राष्ट्रीय उद्देश्यों को बल मिल सकता है।
पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान खोजने के साथ-साथ यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की क्षमता रखती है। आने वाले वर्षों में यदि इस क्षेत्र में निवेश और तकनीकी विकास तेज़ी से आगे बढ़ता है, तो “कचरे से कमाई” का यह मॉडल भारत की हरित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
Prominent Journalist Amritpal Singh
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As a senior journalist and Director of Chardikala Time TV, he has played a vital role in strengthening Punjabi media at a global level.










