
हिमांशु गुप्ता जिला ब्यूरो चीफ प्रयागराज
संगम तीरे माघ महीने में कल्पवास अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। गृहस्थ समस्त मोह-माया से मुक्त होकर भजन-पूजन करेंगे। सुविधा की आस होगी, न किसी प्रकार की अपेक्षा। दिन में तीन बार गंगा स्नान, एक समय भोजन व दिनभर धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, प्रवचन सुनने में समय व्यतीत करेंगे।
प्रयागराज में संगम के किनारे माघ मेले में कल्पवास का महत्व है। पौष पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस अनुष्ठान में श्रद्धालु भजन, पूजन और तपस्या में लीन रहते हैं। कल्पवास 12 वर्षों में पूरा होता है और इसके कई नियम हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। पद्म पुराण, अग्नि पुराण और स्कंद पुराण में इसकी महिमा का वर्णन है। माना जाता है कि इससे जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है।
जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति। पूर्वजों की तृप्ति व मोक्ष की प्राप्ति। कुछ इन्हीं संकल्पना को साकार करने के लिए तीर्थराज प्रयाग में संगम तीरे माहभर का अखंड तप कल्पवास तीन जनवरी पौष पूर्णिमा से आरंभ हो जाएगा। भजन, पूजन व अनुष्ठान का क्रम 15 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलेगा। गृहस्थ नर-नारी तपस्वियों की भांति माहभर भजन-पूजन में लीन रहेंगे।
पुराणों में कल्पवास के 21 नियम बताए गए हैं
1-असत्य (झूठ) न बोलना, 2-हर परिस्थिति में सत्य बोला, 3-घर-गृहस्थी की चिंता से मुक्त होना, 4-गंगा में सुबह, दोपहर व शाम को स्नान करना, 5-शिविर के बाहर तुलसी का बिरवा रोपना व जौ बोना, 6-तुलसी व जौ को प्रतिदिन जल अर्पित करना, 7-ब्रह्मचर्य का पालन करना, 8-खुद या पत्नी का बनाया सात्विक भोजन करना, 9-सत्संग में भाग लेना, 10- इंद्रियों में संयम रखना, 11-पितरों का पिंडदान करना, 12-हिंसा से दूर रहना, 13-विलासिता से दूर रहना, 14-परनिंदा न करना, 15-जमीन पर सोना, 16-भोर में जगना, 17-किसी भी परिस्थिति में मेला क्षेत्र न छोड़ना, 18-धार्मिक ग्रंथों व पुस्तकों का पाठ करना, 19-आपस में धार्मिक चर्चा करना, 20-प्रतिदिन संतों को भोजन कराकर दक्षिणा देना, 21-गृहस्थ आश्रम में लौटने के बाद कल्पवास के नियम का पालन करना।
12 वर्ष में पूर्ण होता है कल्पवास
कल्पवास करने वाले लोगों को लगातार 12 वर्ष संगम तीरे आकर भजन-पूजन करना पड़ता है। 12 वर्ष बाद कल्पवास पूर्ण माना जाता है। इसके बाद कल्पवासी सजियादान करते हैं। इसमें तीर्थपुरोहितों को गृहस्थी का समस्त सामान दान किया जाता है। इसके बाद तमाम लोग कल्पवास समाप्त कर देते हैं, जबकि कुछ उसके बाद भी आते रहते हैं। कल्पवास करने वाले लोगों का घर-परिवार से कोई संबंध नहीं रहता। सुख हो अथवा दु:ख, किसी भी परिस्थिति में कल्पवासी माघ मेला क्षेत्र छोड़कर नहीं जाते। मेला क्षेत्र छोड़ने पर उनका कल्पवास खंडित हो जाता है। ऐसे में उन्हें दोबारा नए सिरे से कल्पवास शुरू करना पड़ता है।
