
रिपोर्ट रोहित टंडन नेशनल ब्यूरो हेड
लखनऊ/सुल्तानपुर जनपद में सिगरेट की खुलेआम कालाबाजारी अब किसी से छिपी नहीं रह गई है। नियम-कानून और एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) को ताक पर रखकर दुकानदार उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा डाका डाल रहे हैं, जबकि संबंधित विभाग आंख मूंदे बैठा है।
जानकारी के मुताबिक,
गोल्ड फ्लैक सिगरेट, जिस पर प्रिंटेड एमआरपी ₹95 अंकित है, उसे ₹110 में बेचा जा रहा है।
वहीं टोटल सिगरेट, जिसकी प्रिंटेड कीमत ₹70 है, वह ₹80 में ग्राहकों को थमाई जा रही है।
यह खेल किसी एक-दो दुकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर से लेकर कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक फैला हुआ है।
बड़े स्टॉकिस्टों पर गंभीर आरोप
स्थानीय सूत्रों की मानें तो सिगरेट कंपनियों के बड़े स्टॉकिस्टों ने जानबूझकर माल डंप कर रखा है, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी दिखाई जा रही है। इसी कमी का फायदा उठाकर फुटकर दुकानदार मनमानी कीमत वसूल रहे हैं।
सवाल यह भी है कि
जब सिगरेट पैकेट पर स्पष्ट रूप से एमआरपी अंकित है,
तब उससे अधिक कीमत पर बिक्री कैसे और क्यों हो रही है?
नियम क्या कहते हैं?
कानूनी रूप से किसी भी उत्पाद को एमआरपी से अधिक मूल्य पर बेचना दंडनीय अपराध है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत:
एमआरपी से ज्यादा कीमत वसूलना
भ्रामक व्यापार व्यवहार की श्रेणी में आता है
और इसके लिए जुर्माना व कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
प्रशासन और विभाग की चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ,
विधिक माप विज्ञान विभाग,
और प्रशासन
अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं कर सका?
क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर कहीं न कहीं संरक्षण भी इस कालाबाजारी को मिल रहा है?
आम उपभोक्ता ठगा, शिकायत का रास्ता भी धुंधला
महंगाई से पहले से परेशान आम आदमी मजबूरी में अधिक कीमत देकर सिगरेट खरीद रहा है। शिकायत करने पर दुकानदार साफ कहते हैं—
“जहां से महंगी मिल रही है, वहीं से बेच रहे हैं।”
कार्रवाई न हुई तो बढ़ेगा अवैध धंधा
यदि समय रहते स्टॉकिस्टों और फुटकर विक्रेताओं पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह अवैध वसूली और ज्यादा बढ़ेगी। सवाल सिर्फ सिगरेट का नहीं, बल्कि कानून के राज और उपभोक्ता अधिकारों का है।
बड़ा सवाल ये है कि प्रशासन जागता है या कालाबाजारी यूं ही फलती-फूलती रहेगी?
